पिछले जन्‍म के पापों की वजह से सारा जीवन लज्जित हुए थे कर्ण

महाभारत

 

महाभारत के सभी पात्र अत्‍यंत रोचक और रहस्‍यमयी रहे हैं। द्रौपदी का पतिधर्म हो या भीष्‍म का प्रतिज्ञा पालन, महाभारत के सभी पात्र किसी न किसी रूप या परिस्थिति में आज के मनुष्‍य को प्रेरणा देते हैं। आज हम आपको महाभारत के ऐसे ही पात्र के बारे में बताने जा रहें हैं जिसे महाभारत काल में एक वीर योद्धा होने के बावजूद समाज में मान-सम्‍मान न मिल सका। जी हां, कर्ण ही वह था जिसे कुंती पुत्र होने के बावजूद सूतपुत्र होने के कारण बार-बार लज्जित होना पड़ा।

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कुंती पुत्र

 

कुंती पुत्र होने के नाते कर्ण का नाम पांडवों के साथ आना चाहिए था किंतु कुंती के कर्ण को त्‍याग देने के बाद उसका लालन पालन एक सूत के घर हुआ था जिस कारण कर्ण सूतपुत्र के नाम से जाना गया। लेकिन कर्ण के इस दुख से परिपूर्ण जीवन के पीछे एक पूर्व जन्‍म की कथा भी छुपी है।

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पूर्वजन्‍म की कथा

 

कर्ण के पूर्वजन्‍म की कथा के अनुसार दंबोधव नाम के एक असुर ने सूर्य देव की कठिन तपस्या कर उनसे यह वरदान हासिल कर लिया था कि उसे हजार कवच हासिल होंगे। इतना ही नहीं इन कवचों पर केवल वही व्यक्ति प्रहार कर सकता था, जिसने करीब हजार सालों तक तप किया हो। दंबोधव की इच्छा यहीं पूरी नहीं हुई। उसने सूर्य देव से यह भी वर मांगा कि जो भी उसके कवच को भेदने का प्रयास करे, उसकी उसी क्षण मृत्यु हो जाए। सूर्यदेव ने उसे यह वरदान दे दिया। वरदान मिलते ही दंबोधव ने चारों ओर कोहराम मचा दिया जिससे दुखी होकर प्रजापति दक्ष की पुत्री मूर्ति ने असुर दंबोधव के संहार का वरदान मांगा। तब भगवान विष्‍णु के वरदान से मूर्ति को विवाह पश्‍चात् भगवान विष्‍णु के रूप में दो बालक नर-नारायण हुए।

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सहस्त्र कवच का अंत

 

नर और नारायण के संयुक्त प्रयास से सहस्त्र कवच का अंत हुआ। 999 कवच के संहार के बाद जब केवल एक कवच शेष रह गया तब दंबोधर अपने प्राणों की रक्षा के लिए सूर्यदेव की शरण में चला गया। नर और नारायण, दोनों सूर्य लोक पहुंचे और सूर्य देव से असुर को वापस करने की मांग की। लेकिन सूर्यदेव ने दंबोधव का बचाव किया जिससे नर-नारायण ने रूष्‍ट होकर सूर्यदेव के साथ-साथ दंबोधव को भी श्राप दिया कि अगले जन्म में दोनों को ही अपनी करनी का दंड भोगना पड़ेगा।

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द्वापर युग

 

द्वापर युग में सूर्यदेव के वरदान से ही असुर दंबोधव ने कर्ण के रूप में जन्‍म लिया। अत: कर्ण ने उसी रक्षा कवच के साथ जन्‍म लिया जो दंबोधर के पास शेष बचा था।

तो इस तरह कर्ण ने अपने पर्वजन्‍मों का फल द्वापर युग में भोगा।

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