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निर्जला एकादशी व्रत का महत्व, पौराणिक कथा तथा विधि

 

निर्जला एकादशी

तिथि प्रारंभ – 12 जून 2019 को 18 बजकर 27 मिनिट पर

तिथि समाप्त – 13 जून 2019 को 16 बजकर 49 मिनिट पर

धार्मिक ग्रंथों के अनुसार जेष्ठ माह की शुक्ल एकादशी को निर्जला एकादशी का व्रत करने का विधान है। प्रत्येक वर्ष में कुल 24 एकादशियाँ होती है उन सब एकादशी जितना पुण्य केवल निर्जला एकादशी का व्रत करने से मिलता है। वैसे तो पूर्ण वर्षभर में कुल 24 एकादशियाँ होती है परन्तु मलमास जिसे अधिकमास कहा जाता है, उसमे कुल 26 एकादशियाँ होती है।

Nirjala Vrat Vidhi and Importance

इस दिन जो श्रद्धालू दान करता है, उसको सभी पापों से मुक्ति मिलती है। इस व्रत में सूर्योदय से द्वादशी के सूर्योदय तक जल न पीने का विधान है, इसी कारण इसे निर्जला एकादशी कहते हैं। इस दिन निर्जल रहकर भगवान विष्णु की आराधना की जाती है। इस व्रत से दीर्घायु और मोक्ष की प्राप्ति होती है।

वर्ष भर की एकादशियों का पुण्य लाभ देने वाली इस श्रेष्ठ निर्जला एकादशी को पांडव एकादशी या भीमसेनी एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। जो श्रद्धालू भक्तिपूर्वक इस कथा को पढ़ते या सुनते है, उन्हें निश्चय ही स्वर्ग की प्राप्ति होती है।

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निर्जला एकादशी के दिन क्या दान करें

निर्जला एकादशी के दिन किया जाने वाला दान सबसे बड़ा दान माना जाता है। इस दिन अन्न, जल, वस्र, आसन, जूता, छतरी, पंखा, फल आदि वस्तुओं का दान करना सर्वश्रेष्ट माना गया है। इस एकादशी का व्रत करने से अन्य एकादशियों पर अन्न खाने का दोष छूट जाता है, तथा सभी एकादशियों के पुण्य का लाभ भी मिलता है। जो जातक श्रद्धा पूर्वक इस पवित्र एकादशी का व्रत करता है, वह समाप्त पापों से मुक्त होकर अविनाशी पद प्राप्त करता है।

निर्जला एकादशी व्रत पूजा विधि

जो श्रद्धालू वर्षभर की समस्त एकादशियों का व्रत किसी कारणवश नहीं कर पाते, उन्हें निर्जला एकादशी का व्रत अवश्य करना चाहिए।

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इस व्रत की विधि इस प्रकार है

  • इस व्रत में सूर्योदय से द्वादशी के सूर्योदय तक जल और भोजन ग्रहण नहीं किया जाता।
  • एकादशी के दिन प्रातः जल्दी उठकर स्नान आदि के पश्चात सबसे पहले भगवान विष्णु की विधिवत पूजा-अर्चना की जाती है। इसके पश्चात भगवान का ध्यान करते हुए ॐ नमो भगवते वासुदेवाय मन्त्र का जाप करें।
  • इस दिन भगवान का कीर्तन करना चाहिए तथा निर्जला व्रत की कथा सुननी चाहिए।
  • इस दिन जो जातक व्रती है उसे जल से भरे कलश को सफ़ेद वस्त्र से ढककर उस पर दान-दक्षिणा रखकर किसी ब्राह्मण को दान करना चाहिए।

इसके बाद दान आदि संपन्न करके इस व्रत का विधान पूर्ण हो जाता है। इस व्रत का फल दीर्घायु, स्वास्थ्यवर्धक तथा सभी पापों का नाश करनेवाला माना गया है।

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निर्जला एकादशी व्रत कथा

पांच पांडवों में भीमसेन खाने-पीने का अत्याधिक शौक़ीन था। उसका अपनी भूख पर कंट्रोल नहीं था, बिना खाए-पिए वह रह नहीं सकता था। भीम के अलावा सभी भाई और द्रोपदी एकादशी के सभी व्रत किया करते थे, इस बात से भीम थोड़े नाराज और परेशान हो जाते थे। एक दिन पांडू पुत्र भीम ने महर्षी वेदव्यास जी से पूछा ‘’हे परम आदरणीय मुनिवर, मेरे परिवार के सभी लोग एकादशी व्रत करते है तथा मुझे भी व्रत करने के लिए कहते है। लेकिन मै भूखा नहीं रह सकता हूँ, अतः आप मुझे कृपा करके बताएं की बिना व्रत किये एकादशी का फल कैसे प्राप्त किया जा सकता है।

भीम के अनुरोध पर वेद व्यासजी ने कहा  ‘’हे पुत्र तुम निर्जला एकादशी का व्रत करो, इस दिन अन्न और जल दोनों का त्याग करना पड़ता है। जो मनुष्य  एकादशी तिथि के सूर्योदय से द्वादशी तिथि के सूर्योदय तक बिना पानी पिए रहता है और सच्ची श्रद्धा से निर्जला व्रत का पालन करता है, उसको वर्ष में जितनी भी एकादशी आती है उन सब एकादशी का फल इस निर्जला एकादशी के व्रत करने से  मिल जाता है’’।

महर्षि वेद व्यास के वचन सुनकर भीमसेन भी प्रभावित हुए और निर्जला एकादशी व्रत का पालन करने लगे और पाप मुक्त हो गए।

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