आयुर्वेद में अनेक रोगों की जड है ‘त्रिदोष’, जानिये ज्योतिषिय प्रभाव….

  

मानव शरीर  तींन  प्रकृति  के अधार पर नियंत्रित होता है कफ,वात व पित। इन तीन प्रकृति के असंतुलित अवस्था को त्रिदोष के नाम से जाना जाता है। इनके कारण हमारे शरीर में अनेक प्रकार के रोग होते है। आयुर्वेद के अनुसार 75% रोग त्रिदोष के कारण होते हैं। ज्योतिष शास्त्र ने हमेशा से आयुर्वेद के पूरक के रूप में कार्य किया है। ज्योतिष शास्त्र की मदद से रोग का कारण जानने के बाद ही उस रोग हेतु अन्य उपचार किये जाते थे जिससे की रोग जड से ठीक हो सके। सुबह के समय कफ, दिन में पित और रात्रि में वात दोष प्रकृति प्रभावशाली  होती है। इसी प्रकार बचपन, जवानी एवं बुढापे में भी इन तीनों दोषो का यही क्रम होता है। इस लेख द्वारा में आपकों त्रिदोष से होने वाले विभिन्न रोगों के बारे में तथा ग्रहों व राशियों के प्रभाव के बारे में बताऊंगा जिनके द्वारा ये प्रभावी होते हैं-

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1- कफ प्रकृति- कफ प्रवृति का असर बचपन में अधिक होता है। अधिक कफ बनता है। सर्दी जुखाम, अधिक निद्रा, सुस्ती, मोटापा, मधुमेह, अस्थमा, शरीर में ठंडापन, खुजली, पेशाब और पसीने की दिक्कत आती हैं। इस दोष को बढाने वाला मुख्य कारक चंद्र होता हैं। इसके अतिरिक्त कर्क, वृश्चिक तथा मीन राशि पर ग्रहों का पाप प्रभाव भी कफ बढाने वाला होता है।

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2- पित प्रकृति- पित प्रकृति के कारण शरीर अधिक गर्म रहता है। युवावस्था में बाल सफेद होना।  नेत्र लाल या पीेले होना।  पेशाब का रंग लाल या पीला होना। दस्त लगना, नाखून पीले होना, देह पीली होना, नाक से रक्त बहना, पेशाब में जलन होना, अधिक भूख लगना, अधिक पसीना आना, हृदय रोग, उच्च रक्तचाप होना, बुखार, तपेदिक आदि रोग पित के कारण होते हैं। सूर्य पित को बढाने वाला ग्रह है। मेष, सिंह तथा धनु राशियां भी पित बढाने वाली होती हैं।

3- वात प्रकृति- वात दोष का प्रभाव वृद्ध अवस्था में अधिक देखने को मिलता है। इस समय अनेक वायु जनित रोग व्यक्ति को विभिन्न तरीके से प्रभावित करते रहते हैं। गठिया, हड्डी के रोग, सूखा रोग, पेट का वायु से फूला होना, बाल कमजोर तथा खुशकी आदि रोग, मानसिक विकार, आखों के रोग, आदि होते हैं। शनि वायु का कारक ग्रह होता है। शनि जब लग्नेश या षष्ठेश हो तो जातक को वायु जनित रोग होते हैं। मिथुन, तुला व कुम्भ राशियां वायु कारक होती हैं।

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जन्म कुंडली में लग्न व लग्नेश की स्थिति के अलावा षष्ठ एवं एकादश भाव से इन वातादि दोषों का पता चलता है। इसके अतिरिक्त दशा जिस ग्रह से सम्बंधित होगी उस से सम्बंधित रोग होंगे। सूर्य-पित, चंद्र-कफ, मंगल-पित, बुध-तीनों प्रकृति से युक्त, गुरु-पित व कफ से युक्त, शुक्र-जल व वायु से युक्त तथा शनि-वायु प्रकृति होता है। यदि बचपन में बुध, चंद्र अथवा शुक्र की दशा हो तो कफ सम्बंधि अधिक रोग होते हैं। युवा अवस्था में मंगल, सूर्य की दशा हो तो जातक को पित रोग अधिक होते हैं, अधिक गुस्सा आता है। वृद्ध अवस्था में शनि,शुक्र, राहु का प्रभाव व्यक्ति को शुष्क रोग देने वाला होता हैं।

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