देवों के देव महादेव तीनों लोकों के स्वामी हैं। सृष्टि के संहारक और पालक भगवान शिव, लिंग रूप में प्रकट हुए थे। शिव के अनेक रूप हैं जिसमें उनका रूद्र और नटराज रूप काफी प्रसिद्ध है। शिव पुराण में भोलेनाथ के सभी रूपों का वर्णन विस्तार से है। शिव ने असंख्य रूप सृष्टि के कल्याण के लिए धारण किए और हर रूप में अपने भक्तों के मन को मोह लिया। शिव के रूद्र और नटराज रूप के पीछे छिपे रहस्य के बारे में आइए जानते हैं-:
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कैसे लिया शिव ने रूद्र रूप
भगवान शिव को अजन्मा अविनाशी कहा गया है। उनकी उत्पत्ति की कोई कथा नहीं है किंतु संसार में आने वाले हर प्राणी, वस्तु का कहीं न कहीं आदि जरूर है। विष्णु पुराण में वर्णित एक कथा से ज्ञात होता है कि ब्रह्मा जी ने शिव के रूद्र रूप को जन्म दिया था। कथा के अनुसार ओंकार स्वरूप शिव ने ब्रह्मा जी से अपने शरीर की रचना का आग्रह किया तो ब्रह्मा जी ने एक सुंदर से बालक का निर्माण किया। जन्म लेते ही वह बालक रोने लगा और ब्रह्मा जी से अपना नाम पूछा तो उन्होंने परमेश्वर के उस स्वरूप को अपनी गोद में बैठा लिया और कहा कि जन्म लेते ही आपने रुदन किया है इसलिए आप रूद्र कहलाएंगे।

नटराज रूप की कथा
सृष्टि के प्रथम नर्तक के रूप में भगवान शिव त्रिपुर असुर का वध करने के बाद प्रसन्नता से नृत्य करने लगे। प्रारंभ में वह अपनी पूरी भुजाएं खोलकर नृत्य नहीं करते क्योंकि ऐसा करने से सृष्टि छिन्न भिन्न होने लगेगी इसलिए वह अपनी भुजाओं को संकुचित करके नृत्य करते हैं लेकिन धीरे-धीरे नृत्य में ऐसे शिव मग्न होने लगते हैं कि उन्हें किसी बात का होश नहीं रहता है और सृष्टि का संतुलन बिगड़ने लगता है। तब संसार की रक्षा के लिए देवी पार्वती प्रेम और आनंद से ‘लास्य‘ नृत्य करने लगती हैं। देवी पार्वती के नृत्य से सृष्टि में संतुलन आता है और शिव शांत होते हैं। नृत्य करते हुए शिव का यही रूप नटराज कहलाता है।
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