ज्योतिष शास्त्र में जब दो ग्रहों का प्रभाव एक जैसा हो तो उस प्रभाव की मिलने की सम्भावनाये बढ जाती हैं। इसी नियम के अधार पर ज्योतिष के समस्त योगों का निर्माण होता है। योग चाहे शुभ हो या अशुभ कारण यही नियम होगा। इस नियम के अनुसार जब किसी वस्तु, तत्व या गुण का प्रतिनिधित्व करने वाले दो ग्रह(ग्रह-भाव) का सयुंक्त प्रभाव एक साथ पडें तो उन के प्रभाव पर दोहरा बल काम करता है। यह नियम ग्रह बल तथा भाव के बल पर भी निर्भर करता है। जैसे शुक्र गुरु का सम्बंध, परस्पर एक दूसरे के विपरीत होने पर भी यें जातक को अत्यधिक विद्वान बनाते हैं, कारण स्पष्ट है कि इन दोनो ही ग्रहों को गुरु का पद प्राप्त है। इसी तरह अंगारक योग भी काम करता है।
मंगल तथा केतु की युक्ति अंगारक योग कहलाती है। यह अंगारक योग केतु व मंगल के सन्युक्त प्रभाव से बनता है। मंगल का दूसरा नाम अंगारक है। मंगल तिक्ष्ण, क्रूर, मारक क्षमता से युक्त ग्रह हैं। मंगल का जन्म कुंडली में अकेला प्रभाव भी हानिकारक हैं। जैसा की आपको ज्ञात है कि मंगल की विशेष भावों में स्थिति मंगल दोष को उत्पन्न करती है। मंगल जन्म कुंडली में सर्वाधिक पीडादायक ग्रह होता है। मंगल के समान ही केतु भी कष्ट दायक ग्रह होता है।
इसीलिये ज्योतिष शास्त्र मे मंगल के समान केतु कहा जाता है। इन दोनो का जन्म कुंडली में सन्युक्त प्रभाव मंगल की दोगुणी ताकत के समान होता है। जिस भाव में यह स्थिति बनेगी उस भाव जनित फलों को इनके प्रभाव से होकर गुजरना ही पडेगा।
अंगारक योग में सबसे ज्यादा अग्नि व क्रोधात्मक प्रभाव देखने को मिलता है। अंगारक दोष व्यक्ति, उसके गुस्से और उसके निर्णय के इर्द-गिर्द घूमता है। इस दोष के बुरे प्रभाव मिलने का एक बडा कारण इस योग के प्रभावों को न समझ पाना है।
इस योग की अनदेखी के परिणामस्वरूप यह दोष और भी हानिकारक होता है। अंदर ही अंदर सुलगती यह अग्नि एकदिन प्रचंड रूप धारण कर लेती है। अंगारक योग के कारण, क्रोध, अग्निभय, दुर्घटना, ब्लड से सम्बंधीत रोग, और स्किन की समस्यायें मुख्य रूप से होती है।
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