ज्योतिष शास्त्र में “यत्पिण्डे तद ब्रह्मांडे” का सूत्र प्रयोग किया जाता हैं । इस सूत्र के अनुसार जो ब्रह्मांड के ग़ुण हैं वही गुण धरती के भौतिक पिण्डो पर भी पडते हैं । हमारे ऋषि मुनियो ने सम्पूर्ण ब्रह्मांड को अपने ही शरीर में देख कर गणना की हैं कितनी बडी बात हैं कि वो गणनाये आज की बडी बडी यंत्र शाला में सत्य सिद्ध हो रही हैं ।
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार हमारा शरीर पांच तत्वो से निर्मित हैं । हमारे शरीर पर बारह राशि व नौ ग्रह का प्रभाव किसी न किसी मात्रा में पडता हैं । इन्ही के अधार पर उन्होने 12 भावो में हमारे शरीर के अंगो को चिन्हित किया हैं । तथा प्रत्येक भाव के कारक नव ग्रह में से कोई ग्रह होता हैं ।
इन 12 भावो व ग्रहो में से किसी के पाप प्रभाव में आने के कारण निर्दिष्ट अंग में कष्ट होने की सम्भावना रहती हैं । इसके अलावा विशेष स्थितियो में कुछ विशेष रोग होते हैं । आइये ज्योतिष में हृदय रोग के क्या क्या कारण होते हैं उस पर विचार करे –
हृदय हमारे शरीर का सबसे महत्वपूर्ण अंग है। हृदय का काम हमारे शरीर में रक्त संचार करना हैं । यह हमारे शरीर के रक्त को आक्सीजन के द्वारा शुद्ध करता हैं । ह्र्दय के कार्यो में व्यवधान होने पर हृदय के घातक रोग होते हैं ।
ज्योतिष के अनुसार सूर्य को हृदय का कारक माना जाता हैं । जिन लोगो को भी ह्र्दय सम्बंधि रोग होते हैं उनमे से अधिकतर व्यक्तियो का सूर्य पाप प्रभावित अवश्य होता हैं । शास्त्रो में ह्र्दय रोग के घटक निम्न हैं –
1. सूर्य यदि चतुर्थ भावगत हो तथा पाप ग्रहो से पीडित हो तो हृदयरोग उत्पन्न करता है।
2. सूर्य यदि शत्रु राशि या कुम्भ राशि गत हो तो धमनी में अवरोध उत्पन्न करता है।
3 – सूर्य षष्ठेश के नवांश में हो या षष्ठेश सूर्य के नवांश में हो।
4- चतुर्थ भाव में सूर्य-शनि की युति हो या मंगल, गुरु, शनि चतुर्थ भाव में हों या चतुर्थ या पंचम भाव में पापग्रह हों।
5- चतुर्थेश चतुर्थ मे पापयुक्त हो तो हृदयरोग देता है ।
6- सूर्य यदि सिंह राशिगत शुक्र के साथ हो तथा मंगल केतु के प्रभाव में हो तो जातक हृदयरोग से ग्रस्त होता है।
7- षष्ठेश सूर्य यदि चतुर्थ भावगत हो तो जातक हृदयरोगी होता है। (जातकालंकार 2।16)
8- लग्नेश निर्बल राहु यदि चतुर्थगत हो तो हृदय रोग होता है। (जा. पारि. 6।19)
9- सिंह राशि के द्वितीय द्रेष्काण में यदि जन्म हो तो हृदयशूल रोग होता है।
10 – तृतीय स्थान में राहु या केतु हो तो हृदयाघात होता है।
11- शनि व राहु का चतुर्थेश पर प्रभाव हो तथा सूर्य से अष्ट्मत होतो यह समस्या रहती हैं ।
12- चतुर्थ भाव में पापग्रह हो और चतुर्थेश पापयुक्त हो तो हृदयरोग उत्पन्न करता है ।
13- वक्री ग्रह का चतुर्थ में पाप प्रभाव से युक्त होना हृदय रोग या हार्ट अटैक के संकेत देता हैं ।
14- वृश्चिक, सिंह व धनु राशिगत सूर्य हृदय रोग उत्पन्न करता है।
15- चतुर्थ भावगत षष्ठेश की युति सूर्य-शनि के साथ होने पर हृदयरोग होता है।
16- चतुर्थगत यदि शनि, भौम, गुरु हो तो हृदयरोग होता है।
17- चतुर्थ भाव में राहु, बुध व वक्री मंगल युवा अवस्था में ही हृदय रोग दे देते हैं ।
उपाय –
1 सूर्य भगवान को नित्य प्रात: काल जल अर्पण करे ।
2- रविवार के दिन ताम्बे के साथ बहते जल में गुड प्रवाहित करे 21 सप्ताह ऐसा करे ।
3- भगवान नरायण के मंदिर में 9 बदाम बुध वार की प्रात: चढाये ।
4 – गुड़ की 9 मीठि रोटी बनाये रविवार की प्रात: 3 गाय को खिलाये ।
5 – रात्री के समय रोगी के सर से ताम्बे के सिक्के से उतारा करे तथा उसे अगले दिन सूर्योदय के उपरान्त गरीब को दे ।
6 – माता पिता को प्रसन्न रखे व उनसे आर्शिवाद प्राप्त करे । तथा आदित्य हृदय स्त्रोत का पाठ करे ।
7 – शिव का रुद्राअभिषेक शहद के द्वारा करवाये ।
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