कुंडली का दूसरा भाव धन और ग्यारहवां भाव आय का कारक होता है। आर्थिक स्थिति चौथे और दसवें भाव पर निर्भर करती है। इन भावों के स्वामी प्रबल हों तो जातक को शुभ फल मिलता है और वह रातों-रात गरीब से अमीर बन जाता है।
अगर धन भाव का स्वामी छठे घर में, सुख भाव का स्वामी अष्टम भाव में या लाभ भाव का स्वामी द्वादश भाव में हो तो जातक को धन की कमी अथवा कर्ज की स्थिति बनी रहती है।
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ग्यारहवां घर आय का भाव कहलाता है। इस भाव में उपस्थित राशि और ग्रह पर ही जातक की आय निर्भर करती है। यदि इस भाव का स्वामी कमज़ोर है तो जातक की आय कम होती है वहीं इस भाव में मजबूत ग्रह के होने पर जातक खूब धन कमाता है।
लाभ भाव में कई ग्रह विराजमान होते हैं या कई ग्रहों की नज़र इस स्थान पर पड़ती है तो आय के स्रोत खुलते हैं।
यदि आय भाव में शुभ ग्रह बैठा है किंतु उस पर पाप ग्रहों की दृष्टि पड़ रही है तो आय के साधनों में रुकावटें आती हैं।
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