मायवी भगवान विष्णु के छल…..

मायापति भगवान विष्णु की माया अपरम्पार हैं। भगवान विष्णु अपनी माया द्वारा मिलकर जगत कल्याण हेतु अनेक प्रपंच रचते रहते हैं। एक तरफ जहां शिव और ब्रह्मा अत्यधिक सरल व शांत हैं वही दूसरी तरफ भगवान विष्णु भक्तों के उद्धार हेतु विभिन्न रूपों और अवतारों में जगत का कल्याण करते हैं। भगवान विष्णु हमेशा बुराई का अंत करते हैं चाहे वो किसी भी तरीके से हो। इस कारण सभी देवी देवताओं में सर्वाधिक अवतार भगवान विष्णु के हैं। इस लेख द्वारा मैं भगवान विष्णु के उन छलों को आपकों बताऊंगा जब भगवान विष्णु को किसी न किसी कारण से छल करना  पडा…

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1- मधु-कैटभ  वध हेतु छल- यह कथा उत्पति के आरम्भ काल की हैं भगवान विष्णु के कानों के मैल से हुई। दोनों राक्षसों की दृष्टी जब ब्रह्मा जी पर पडी तो वे ब्रह्मा को खाने के लिये उद्धत हो उठें। जब ब्रह्मा जी ने दोनों असुरों को अपनी ओर आते देखा तो उन्होने विष्णु जी की शरण ली। भगवान विष्णु ने तत्पश्चात उन महादैत्यों के संग अनेक वर्षो तक युद्ध किया पर उन्हे हरा न पाये। दोनों ही असुर महाशक्तिशाली थे, भगवान विष्णु ने जब देखा की इन से शक्ति के द्वारा नही जीता जा रहा तब उन्होने अपनी माया का प्रयोग किया। माया के वशिभूत होकर दोनों ही असुर कहने लगे विष्णु हम तुम्हारे पराक्रम से अत्यधिक प्रसन्न हैं। हमसे वर मांग लो। भगवान विष्णु ने उसी समय दोनों असुरों को कहा की अपनी मृत्यु का वर हमे दो, माया के वशीभूत होकर दोनों असुरों ने जब चारों तरफ जल ही जल देखा तो वे भगवान से बोले हमे ऐसी जगह मारों जहां जल न हो तब भगवान विष्णु ने अपनी जंघा में रखकर उनका अंत कर दिया।

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2- भस्मासुर को उसी की शक्ति से किया भस्म- भस्मासुर की कथा आपने अवश्य सुनी होगी। भगवान शिव की कृपा से इस असुर को वरदान मिला की यह जिस के सर पर भी हाथ रखेगा वो तत्काल भस्म हो जायेगा। भस्मासुर ने शिव को सर्वप्रथम भस्म करने की सोची। शिव, भस्मासुर को अपनी ओर आते देख उसकी चेष्टाओं को समझ कर वहां से भागने लगे। भागते-भागते जब वे त्रिकूट पहाड पर पहुंचे तब भगवान विष्णु ने मोहिनी का रूप धारण कर भस्मासुर को अपने वश में कर लिया। अपने नृत्य से भगवान विष्णु ने उसे ऐसा मोहित किया की वो भी मोहिनी के समान भाव भंगिमा कर नृत्य करने लगा। कुछ समय बाद नृत्य करते-करते जैसे ही मोहिनी को देख भस्मासुर ने अपना हाथ अपने सर पर रखा दिया वो तत्काल भस्म हो गया।

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3- अमृत हेतु असुरों से छल- अमृत मंथन के पश्चात देवताओं और असुरों में विवाद छिड गया। दोनों ही पक्ष एक-दूसरे से अमृत कलश छिनने के लिये भरसक प्रयत्न कर रहे थे। इसी समय भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप धारण किया और असुर और देवताओं के मध्य विवाद को मिटाने लगे। मोहिणी के रूपजाल में बंधे असुर व देवताओं ने अमृत कलश भगवान विष्णु को दे दिया। भगवान जानते थे यदि असुर अमर हो गये तो सर्वत्र अन्याय होने लगेगा। भगवान विष्णु ने छल से सारा अमृत देवताओं को पिला दिया।

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4- वृन्दा संग छल, तुलसी कथा- भगवान शिव के अंश से उत्पन्न हुआ जालंधर अत्यधिक शक्तिशाली असुर था। उसने इंद्र आदि समस्त देवताओं पर विजय प्राप्त कर ली थी। जालंधर की पत्नि वृन्दा थी। वृन्दा का पतिव्रत धर्म जालंधर के साथ होने के कारण इस असुर को हराना असम्भव के समान हो गया। अनेक बार भगवान शिव से जालंधर का युद्ध हुआ लेकिन वृन्दा के सतीत्व के कारण उसका वध नही हो पा रहा था। तब भगवान विष्णु ने छल पूर्वक जालंधर के रूप में वृन्दा के सतीत्व को भंग कर दिया। वृन्दा के सतीत्व भंग होते ही जालंधर भगवान शिव के हाथों मारा गया। वृन्दा  को जब छल का ज्ञान हुआ तो उन्होने आत्मदाह कर लिया, वृन्दा की राख से तुलसी पोधे की उत्पति होने के कारण ही तुलसी को वृन्दा का रूप कहा जाता हैं।

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5- भगवान शिव व पार्वती से छल- धरती पर श्री बद्रीनाथ धाम भगवान विष्णु का प्रिय स्थान है, यह दूसरे बैकुन्ठ के नाम से भी जाना जाता है। लेकिन कभी यह स्थल भगवान शिव व पार्वति का हुआ करता था। इस रमणीय व सुंदर स्थल को देख भगवान विष्णु इतने मोहित हुये की उन्होने भगवान शिव को ही छल दिया । पौराणिक कथा के अनुसार भगवान शंकर पार्वती जी के साथ बद्रीनाथ में रहा करते थे। जब विष्णु जी ने बद्रीनाथ धाम को देखा तो यह जगह उन्हें भा गई और उन्होंने इसे पाने के लिए एक योजना बनाई। उन्होंने एक सुंदर बालक का रूप धारण किया और यहां आकर जोर-जोर से रोने लगे माता पार्वति जी ने जब बालक को रोते हुये देखा तो उन्हे बालक पर दया आ गई, भूख से व्याकुल बालक को माता पार्वति अपने संग घर ले आई तथा बालक को भोजन करवा कर शान्त किया। कुछ देर बाद बालक को नींद आ गई। बालक को सोते देख माता पार्वति शिव संग घर से थोडी दूर भ्रमण हेतु निकल गई। भगवान विष्णु को इसी समय का इंतजार था, वे तुरंत उठे और घर के दरवाजे अंदर से बंद कर दिये। जब पार्वति-शिव वापिस आये तो घर को अंदर से बंद हुआ देखते हैं, उन्होने बालक से जब द्वार खोलने के लिये कहा तब अंदर से आवाज आती है भगवान यह जगह मुझे पसन्द आ गई है, इस स्थल को मेरे लिये छोड दिजिये आप कहीं और जाइये तब भगवान शिव पार्वति संग केदार नाथ में चले गये।

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