हिंदू धर्म में चार आश्रमों का वर्णन हैं। ब्रह्माचर्य आश्रम, गृहस्थ आश्रम, वानप्रस्थ आश्रम और सन्यास आश्रम। इन चारों आश्रम में गृहस्थ जीवन को ही सर्वश्रेष्ट बताया गया है। इसका कारण इस आश्रम में संतान की प्राप्ती होती हैं जिससे की हमारे वंश का नाम चलता रहे। संतान के द्वारा ही पिता व पित्रों का कल्याण होता है।
क्यों बनता है पितृदोष…
लेकिन जब संतान के द्वारा अपने पिता या पूर्वजों की अनदेखी की जाती है या उनके साथ बुरा बर्ताव किया जाता है तब पितृ उसे रुष्ट होकर श्राप देते है। यही श्राप पितृ दोष कहलाता हैं। यह जरूरी नही की पित्रों का अपमान आपने ही किया हो, ये कर्म आपके पिता, दादा या अन्य किसी पूर्वज के द्वारा हो सकता है। यदि आपकी कुंडली में पितृ दोष है तो इसके दो कारण हो सकते है या तो आपके द्वारा पिता(दादा) का अपमान या बुरा बर्ताव होगा। या फिर दूसरा कारण इसका यह हो सकता की आपके पिता, दादा, या किसी अन्य के द्वारा यह अपराध हुआ है।
ये समस्या पितृदोष की निशानी है….
कैसे जाने पितृदोष हैं कि नही…
पितृ कारक ग्रह सूर्य एवम चंद्र होते हैं। जब इन दोनो में से कोई ग्रह शनि के साथ स्थित हो, पापी ग्रहों का प्रभाव इन पर हो या दशम भाव व भावेश पर हो तो पितृ दोष बनता हैं। अर्थात शनि- सूर्य या शनि-चंद्र युति पर अन्य अशुभ ग्रहों का प्रभाव हो साथ ही दशमेश व दशम भाव अशुभ प्रभाव में हो तो पितृदोष होता है।
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