‘पिनाक धनुष’ देवता थर्रा उठते थे जिसकी टंकार से …

प्रजापति दक्ष के विशाल यज्ञ में सभी देवी देवताओं को आमंत्रण दिया गया था लेकिन शिव को तुच्छ समझे जाने पर उन्हे यज्ञ में शामिल नही किया गया। जबकी शिव दक्ष प्रजापति के दामाद भी थे। जब सती को इस बात का पता चला तो वे शिव के मना करने पर भी अपने पिता के यज्ञ में गई, पिता द्वारा अपने पति और देवों के देव शिव का अपमान करने से उन्होने हवन कुंड में ही अपने प्राणों का त्याग कर दिया। भगवान शिव को यह पता हुआ तो उन्होंने क्रोध में जैसे ही पिनाक धनुष की टंकार करी उस समय सभी देवी देवता महाप्रलय की स्थिति देखकर सहसा थर्रा उठें। महारुद्र का भयंकर पिनाक धारण किया हुआ स्वरूप साक्षात महाकाल के समान था। उन्होने राजा दक्ष और उसके यज्ञ को नष्ट किया बाद में देवताओं के विनय करने पर वे शान्त हुये। और देवताओं को पिनाक धनुष दे दिया।

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पिनाक धनुष से हुआ था त्रिपुरासुर का वध…

पिनाक धनुष से ही महादेव ने तीनों लोकों में अधिकार कर चुके त्रिपुरासुर का वध किया था। त्रिपुरासुर ने देवताओं से उनके अधिकार छीन कर स्वयं तीनों लोकों का अधिपति बन बैठा। देवताओं की अत्यंत दयनीय दशा देखकर शिव ने तीनों लोकों में व्याप्त राक्षसों का नाश कर त्रिपुरासुर का वध किया था।

सीता स्वयंवर में राम ने तोडा था पिनाक को…

बाद में देवताओं ने राजा जनक के पूर्वज देवरात को यह धनुष दिया था। शिव-धनुष उन्हीं की धरोहरस्वरूप राजा जनक के पास सुरक्षित था। जनक ने सीता के स्वंयवर के समय इस धनुष को तोडने की शर्त रखी। अनेक राजाओं ने इसे उठाने का प्रयास किया परंतु वे इसे हिला भी न पाये बाद में श्री राम ने इस धनुष को तोडा था।

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स्वर्ग को अपने बाणों से  ढकने  के कारण नाम पडा  था…

पिनाक धनुष के सम्बंध में कहा जाता हैं इसे देवताओं के कहने पर विश्वकर्मा ने बनाया था। विश्वकर्मा ने शिव और विष्णु के लिये अलग अलग दो धनुष बनाये थे। इस धनुष के तीरों ने एक बार सम्पूर्ण स्वर्ग लोक को आच्छादित कर दिया था जिस कारण इसे पि(ढकना) नाक(स्वर्ग) पिनाक के नाम से जाना जाने लगा।

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