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सावन के पवित्र मास में क्यों की जाती है शिव की भस्म से आरती? क्यों लगाते है भोलेनाथ शरीर पर भस्म, क्या है इसके पीछे का रहस्य?

सावन का महीना शिव भक्तों के लिए सबसे पवित्र महीना है। शिव की आराधना करने के लिए, भोले के दर्शन के लिए श्रद्धालूओं की भारी भीड़ शिव मंदिरों में देखने को मिलती है। सावन के महीने में सोमवार के दिन शिव मंदिर में जाकर शिव से आशीर्वाद प्राप्त करना शिव भक्तों का मुख्य उद्देश होता है, शिव की आराधना करने से सारी समस्याओं और बाधाओं से मुक्ति मिलती है। शिव भगवान अपने भक्तों की बहुत जल्दी सुनते है, शिव भगवान हमेशा लोगों को सुख, शांति और समृद्धि प्रदान करते है।

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क्यों की जाती है शिव की भस्म से आरती? 

यह प्रथा उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर में प्राचीन काल से होती आ रही है, यह भस्म आरती विश्व विख्यात है। यहाँ ख़ास तरह की भस्म आरती होती है। सावन के महीने में अनेकों शिव मंदिरों में लोग शिवलिंग पर दूध, गंगाजल, बिल्वपत्र, भांग, धतूरे के फूल चढ़ाते है, तो कई मंदिरों में शिव की भस्म से आरती की जाती है। इस धरती पर जो भी इंसान है, उन्हें अंत में मिट्टी में ही मिल जाना है ।  

आइये जानते है शिव की भस्म से आरती करने के पीछे का रहस्य

दार्शनिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो शिव के शरीर पर भस्म लगाना यही दर्शाता है की यह शरीर जिस पर हम बहुत घमंड करते है, इतराते है, इसकी साजसज्जा और रक्षा के लिए न जाने हम कितने जतन करते है परन्तु यह सिर्फ एक मोहमाया है, जिसके जंजाल में हम फंसे हुए है, एक दिन इसी भस्म की तरह हमारा शरीर भी राख हो जाएगा। शरीर क्षणभंगुर है और आत्मा अनंत है। भोलेनाथ को हमेशा अजीबो-गरीबो वस्तुएं प्रिय है, जैसे -जहरीला धतूरा, नशीली भांग, बिल्वपत्र, भस्म आदि। भगवान शिव अपने तन पर भस्म रमायें रहते है लेकिन इसके पीछे का रहस्य बहुत से लोग नहीं जानते है।

भोलेनाथ ने अपने तन पर जो भस्म रमाई है, वह भस्म उनकी पत्नी सती की चिता की भस्म थी, जो की अपने पिता द्वारा भगवान शिव के अपमान से आहात होकर वहां हो रहे यज्ञ के हवनकुंड में कूद गयी थी। भोलेनाथ को जब इस बात का पता चला तो वो बहुत बेचैन हो गये, क्रोधित हो गये और जलते हुए यज्ञ कुंड से सती के शरीर को बाहर निकालकर प्रलाप करने लगे, विक्राल रूप धारण कर लिया और पूरे ब्रह्माण्ड में घूमते रहें, उनकी बेचैनी, क्रोध से यह पृथ्वी और सृष्टि खतरे में पड गयी। पूरी सृष्टि में हाहाकार मच गया। जहाँ जहाँ सती के अंग गिरे वहां वहां शक्तिपीठ की स्थापना हो गयी फिर भी भोलेनाथ का संताप, क्रोध कम नहीं हुआ तब श्री हरि ने सती के शरीर को भस्म में परिवर्तित किया। सती की याद में भोलेनाथ ने इसी भस्म को सती की अंतिम निशानी के रूप में अपने तन पर लगा लिया। पुरानों में इस भस्म का विवरण भी मिलता है, पहले भगवान श्री हरि ने देवी सती के शरीर को छिन्न भिन्न कर दिया था, जहाँ जहाँ सती के अंग गिरे वहां वहां शक्तिपीठ की स्थापना हो गयी थी।

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कहते है, हर इंसान भस्म में मिल जाएगा, एक न एक दिन सबको मिट जाना है, राख बन जाना है, क्या तेरा क्या मेरा है, सब कुछ यही छोड़ जाना है। शिवपुराण में इस बात का उल्लेख है की भगवान शिव को मिट्टी, पेड़-पौधों से बहुत प्रेम है, वो हमेशा पहाड़ों, जंगलों में रहे है, इसलिए उन्हें जंगली वस्तुओं से अधिक लगाव है। ऐसी मान्यता है की भस्म के जरिये शिव भगवान अपने भक्तों के निकट पहुँचने का प्रयास करते है।

भस्म शरीर को ठंडक पहुंचाने का कार्य भी करता है, इससे कई प्रकार के कीटाणुओं से शरीर की रक्षा होती है इसलिए कई साधु-संतों को, नागा साधुओं को हमने पूरे शरीर पर भस्म लगाए हुए देखा है। भगवान शिव के तन पर भस्म रमाने का एक रहस्य यह भी है कि भस्म की यह राख विरक्ति का प्रतीक है। भगवान शिव की भस्म से आरती करने के पीछे एक ही सन्देश मिलता है कि अंत में सब कुछ राख यानि भस्म हो जाना है। ज्यादा मोहमाया में नहीं पड़ना चाहिए, शिव हमेशा अपने भक्तों को याद दिलाते रहते है, इसलिए शिव की भस्म आरती की जाती है, इससे भक्तों को हमेशा यह सन्देश मिलता रहता है की पाप के रास्ते पर चलना छोड़ दे, अंत में सबको राख में ही मिल जाना है।

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