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वर्ष 2021 में पापमोचनी एकादशी का व्रत कब हैं, जानिए व्रत का मुहूर्त और कथा

पापमोचनी एकादशी व्रत

7 अप्रैल 2021, बुधवार

पापमोचनी एकादशी का पारण मुहूर्त – 13:39 से 16:10 तक

कुल समय- 2 घंटे 31 मिनट

हरि वासर समाप्त होने का समय- 8:42 बजे (8 अप्रैल)

 हिन्दू धर्म में एकादशी का विशेष महत्व है। हिन्दू धर्म में एकादशी के दिन व्रत करना बहुत ही शुभ फलदायी माना जाता है। वैसे तो पूर्ण वर्षभर में कुल 24 एकादशियाँ होती है। इस दिन व्रत करने से सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती है। मनुष्य के पूर्वजन्म और वर्तमान दोनों जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं। पापमोचनी एकादशी का अर्थ इसके नाम में ही छिपा हुआ हैं। पापमोचनी एकादशी दो शब्दों से मिलकर बनी हैं। पाप यानी की दुष्ट कर्म, गलती और मोचनी यानी की मुक्ती, छुड़ाने वाली अर्थात पापमोचनी एकादशी का मूल अर्थ हुआ हर तरह के पापों से मुक्ति दिलाने वाली। इस दिन जो भी जातक पूरी श्रद्धा से व्रत करता हैं, उसे जीवन में सुख-समृद्धि के साथ साथ मोक्ष की प्राप्ति होती हैं। इस व्रत में भगवान विष्णु की पूजा की जाती है।

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 पापमोचनी एकादशी व्रत का महत्व

वर्तमान समय में पापमोचनी एकादशी उपवास को उचित विधि से करना एव कठोरता से उसका पालन करना मुश्किल है, इसलिए भक्त पापमोचनी एकादशी के दिन पूर्ण उपवास तो रखते हीं है साथ ही मंदिरों में घर के आस-पास विशेष भजन कीर्तिन करने के लिए सभाएं आयोजित करते हैं, इस दिन जगह-जगह गीता का पाठ किया जाता है। व्रत करने वाला जातक तन-मन शुद्ध कर भगवान विष्णु से प्रार्थना करता हैं। इस दिन गरीबों को दान पुण्य किया जाता है। भगवान से सभी पापों को दूर करने एवं क्षमा याचना कर, अच्छे आचरण का आशीर्वाद मांगा जाता है।

पापमोचनी एकादशी व्रत पूजा विधि

पापमोचनी एकादशी का व्रत समस्त पापों का नाश करने के लिए ही किया जाता हैं, आइए जानते हैं इसकी पूजा विधि

  1. पापमोचनी एकादशी के दिन सूर्योदय होने के बाद स्नान करने के बाद ही व्रत का संकल्प करें।
  2.  स्नान करने के बाद भगवान विष्णु की षोडशोपचार विधि से पूजा करें और पूजन के उपरांत भगवान को धूप, दीप, चंदन और फल आदि अर्पित करके तन-मन शुद्ध करके आरती करनी चाहिए।
  3.  इस दिन भिक्षुक, जरुरतमंद किसी भी गरीब व्यक्ति व ब्राह्मणों को दान और भोजन अवश्य कराना चाहिए।4.
  4. पापमोचनी एकादशी पर रात्रि में निराहार रहकर जागरण करना चाहिए और अगले दिन द्वादशी पर पारण के बाद व्रत खोलना चाहिए।
  5. पापमोचनी एकादशी तिथि को जागरण करने से कई गुना पुण्य भी मिलता है।

प्राचीन समय से ही मान्यता है कि इस दिन व्रत करने के कारण समस्त पापों का नाश होता है और सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है।

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पापमोचनी एकादशी कथा

पापमोचनी एकादशी का व्रत करने के पीछे एक कथा छिपी है, जिसे सुनने और पढ़ने मात्र से ही मुक्ति मिल जाती है। यह कथा भगवान श्री कृष्ण ने युधिष्ठर को सुनाई थी। उन्होने कहा था कि प्राचीन काल में एक चैत्ररथ नामक एक वन था। इस वन में इंद्र देव, अप्सरा और गंधर्व कन्याओं के साथ भ्रमण किया करते थे और यही वह वन था जहां च्यवन ऋषि के पुत्र मेधावी तपस्या करते थे। अप्सराएं कामदेव की अनुचरी थीं और कामदेव शिव के विद्रोही थे क्योंकि शिव ने कामदेव को उनकी तपस्या भंग करने के आरोप में भस्म कर दिया था। इधर इन्द्र भी ऋषि को तपस्या करते देख डरने लगे थे कि कहीं यह देव आदि देव से मेरा सिंहासन ही ना मांग ले। इस वजह से बदला लेने के लिए कामदेव ने एक अप्सरा को उनका ध्यान भंग करने को कहा। इस काम को करने के लिए कामदेव ने मंजूघोषा नामक अप्सरा को कहा। मंजूघोषा ने इसे अपना काम समझ अपने नृत्य और हावभाव से ऋषि का ध्यान भंग कर दिया। और ऋषि मंजूघोषा के प्रेम में पड़ गए। मेधावी ऋषि अब जगह-जगह मंजूघोषा के साथ विहार करने लगे। उसके प्यार में सुध-बुध खोकर दिन-रात भोग-विलास में रहने लगे। उन्हें रात-दिन की भी सुधी नहीं रही। ऐसे रहते-रहते करीब 57 साल बित गए और मजूंघोषा को अब लगा कि मेरा काम तो हो गया अब मुझे वापस स्वर्गलोक जाना चाहिए। जिसके बाद एक दिन मंजुघोषा ने मेधावी ऋषि से स्वर्गलोक जाने की अनुमति तो मेधावी ऋषि कहने लगे कि प्रिय अभी तो कल ही तुम आई हो अभी जाने लगी। तब मंजूघोषा ने कहा कि आपको समय का ज्ञात नहीं हमें साथ रहते काफी समय बित गया है। उसी समय ऋषि को एहसास हुआ कि वह रसातल में जा चुके हैं। उनकी तपस्या भंग हो चुकी है। और इस सब का कारण उन्होंने मंजुघोषा को माना। जिसके बाद मेधावी ऋषि ने मजूंघोषा को कहा कि तुमने मेरे साथ यह अच्छा नहीं किया। मेरा अमूल्य समय नष्ट किया है तुमने, मैं तुम्हें श्राप देता हूं कि तुम पिशाचनी बनोगी। मंजुघोषा को पिशाचनी का श्राप देने के बाद मंजुघोषा ने ऋषि से अपने किए की गलती की माफी मांगी तो ऋषि ने पापमोचनी एकादशी का व्रत करने की सलाह दी और कहा कि इससे ही तुम्हारे पाप खत्म होंगे। जिसके बाद मेधावी ऋषि जब वापस आश्रम पहुंचे तो उन्होंने अपने पिता को सारी बात बताई। च्यवन ऋषि ने कहा कि तुमने मंजुघोषा को श्राप देकर खुद को पाप का भोगी बना लिया है और अगर तुम्हें अपने पाप खत्म करने हैं तो तुम्हें भी पापमोचनी एकादशी का व्रत करना होगा। जिसके बाद मंजूघोषा और मेधावी ऋषि ने पूर्ण विधि से पापमोचनी एकादशी का व्रत किया। जिससे उनके सारे पाप नष्ट हो गए। मेधावी ऋषि फिर से तपस्या करने लगे और मंजुघोषा को पिशाचनी यौनी से मुक्ति मिली। यह कथा इस बात का प्रमाण है कि इस व्रत को करने से सारे पाप नष्ट हो जाते हैं।

इस प्रकार पापमोचनी एकादशी का व्रत करके अप्सरा मंजूघोषा ने श्राप से और मेधावी ऋषि ने पाप से मुक्ति पाई।

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