क्यों पांडवों से पहले दुर्योधन पुहंचा था स्वर्ग

महाभारत इतिहास का सबसे बड़ा युद्ध था जिसमें हजारों-सैंकड़ों की संख्या में लोग मारे गए थे। चचेरे भाइयों के बीच हुए इस युद्ध में पांडव पुत्रों की जीत हुई थी। सर्वविदित है कि महाभारत के युद्ध के कुछ वर्षों पश्‍चात् पांडव द्रौपदी सहित स्वर्ग की यात्रा पर निकल गए थे। इस यात्रा में धर्म रूपी काला कुत्ता भी उनके साथ गया था। किवदंती है कि पांडवों की स्वर्ग यात्रा बेहद रहस्यमयी थी जिसमें स्वर्ग तक केवल युधिष्ठिर ही पहुंच पाए थे अथवा बाकी चार पांडवों और द्रौपदी की स्वर्ग की यात्रा में ही मृत्यु हो गई थी।

सबसे पहले हुई द्रौपदी की मृत्यु

महाभारत ग्रंथ में वर्णित 18 पर्वों में से एक है महाप्रस्थानिका। इस पर्व में पांडवों की मोक्ष की यात्रा का उल्लेख किया गया है। इसके अनुसार पांडव पूरे भारत की यात्रा के पश्चात् मोक्ष प्राप्ति हेतु हिमालय की गोद में चले गए थे। पांडवों को हिमालय के मेरु पर्वत के पास स्व्रर्ग का मार्ग मिला था।

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स्वर्ग की यात्रा के दौरान केवल युधिष्ठिर ही थे जो सशरीर स्वर्ग तक पहुंचे थे क्योंकि अन्य सभी पांडवों सहित द्रौपदी ने भी अपने जीवनकाल में कभी न कभी अधर्म का साथ अवश्यक दिया था। इसी क्रम में सबसे पहले द्रौपदी की मृत्यु हुई क्योंकि वह अपने पतिधर्म का पालन नहीं कर सकी थी। इसका कारण था अर्जुन…द्रौपदी अर्जुन को अपने बाकी चार पतियों से अधिक प्रेम करती थी और इसी वजह से वह अधर्म की पात्र बनी।

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सहदेव की मृत्यु
द्रौपदी के बाद सहदेव की मृत्यु हुई क्योंकि वह स्वयं को बहुत बुद्धिमान समझता था। उसके इसी अहंकार ने उसे मोक्ष की यात्रा पूरी नहीं करने दी।

नकुल ने त्यागे प्राण
इसके बाद नकुल ने अपने प्राण त्याग दिए क्योंकि उसे अपने आकर्षण और सुंदरता पर बहुत घमंड था।

अर्जुन की बारी
अर्जुन को अपनी धर्नुविद्या पर बहुत गर्व था। वह अपने बल और दक्षता पर अभिमान करता था। इन्हीं कारणों की वजह से अर्जुन अपनी यात्रा पूरी नहीं कर पाया।

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भीम की भूख
अर्जुन के पश्चात् भीम की मृत्यु हुई। इसका कारण था कि भीम ने अपने पूरे जीवन काल में दूसरों की शुधा की चिंता किए बिना अत्यधिक भोजन ग्रहण किया। इससे उसके स्वार्थी होने की प्रवृत्ति के बारे में पता चलता है।

युधिष्ठिर का साथी
सभी की मृत्यु के पश्चाुत् युधिष्ठिर ने अपनी आगे की यात्रा उस धर्मरूपी काले कुत्ते के साथ पूरी की। यह काला कुत्ता धर्मराज थे जिन्होंने अंत समय तक भी युधिष्ठिर का साथ नहीं छोड़ा था। केवल युधिष्ठिर ही ऐसे थे जो सशरीर स्वर्ग पहुंच पाए थे।

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