त्रिदलं त्रिगुणाकारं त्रिनेत्रं त्रयायुधम्।
त्रिजन्म पापसंहारंमेकबिल्वं शिवार्पणम।।
ज्योतिष व आयुर्वेद में अनेक दोषों का नाशक है ‘बिल्वपत्र’……
शिव भोले नाथ शीघ्र प्रसन्न होने वाले देव है। जहां अन्य देवों को अनेकों प्रकार से पूजन कर भी प्रसन्न करना अत्यधिक जटिल होता है दूसरी तरफ भोले नाथ मात्र धतूरे के फल और बिल्वपत्र के चढाने से इतने प्रसन्न होते है की भक्त के सभी पापों को खत्म कर देते हैं। कहा जाता है कि भोले नाथ को बिल्वपत्र इतना प्रिय है की एक ही बिल्वपत्र को धोकर अनेकों बार चढाने पर भी भोलेनाथ अत्यधिक प्रसन्न होते है। शास्त्रों में कहा जाता है की बिल्व के मूल में शिव का वास होता है। ज्योतिष शास्त्र में धन प्राप्ती हेतु शिवलिंग पर बिल्वपत्र चढाने का उपाय बताया जाता है। आखिर ऐसा क्या कारण है जिसके कारण बिल्वपत्र शिव को अत्यधिक प्रिय है और भक्त की धन सम्बंधि समस्या खत्म हो जाती है। इस विषय में शास्त्रों में एक कथा प्रसिद्ध है जो बिल्व वृक्ष की उत्पति तथा महता को व्यक्त करती है-
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शिवजी पार्वति को बिल्वपत्र की उत्पति की कथा बताते हुये कहते है की हे देवी जगत के आरम्भ के समय में सभी देवों ने मेरे अंश से उत्पन्न हुये रामेश्वरम लिंग का विधिवत पूजन किया था। तब मेरे प्रभाव से सभी देवों की चेतना व ज्ञान का अत्यधिक विस्तार होने लगा। उस समय ज्ञान की देवी सरस्वति का प्रभाव इतना अधिक हुआ की स्वयं केशव भी प्रभावित हुये। सरस्वति के प्रति उनके मन में अत्यधिक प्रीति होने लगी जिस कारण लक्ष्मी जी अत्यधिक रुष्ट व चिंतित होने लगी तब उन्होने काफी समय तक मेरे विग्रह रूप लिंग की तपस्या की फिर उन्होने मेरे समक्ष एक वृक्ष का रूप लेकर अपने पत्र व पुष्पों से मेरा पूजन किया।
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माता लक्ष्मी द्वारा इस तरह से पूजन करने से शीघ्र ही उन्हे मेरा अनुग्रह प्राप्त हुआ। तब महालक्ष्मी ने मुझसे कहा कि आप केशव के मन से वाग्देवी का स्नेह समाप्त करें तब मेने उन्हे समझाया की भगवान हरि के ह्रदय में सदैव आपका ही वास है, वाग्देवी के प्रति किसी प्रकार की आसक्ति नही है वरण श्रद्धा है तब वे अत्यधिक प्रसन्न हुई और केशव के हृदय में स्थित होकर निरंतर उनके साथ विहार करने लगी। माता के चरणों में मेरा वास मुझे अत्यधिक प्रिय है। इसीलिये हे देवी मै सदैव इस वृक्ष के मूल में निवास कर प्रसन्नता प्राप्त करता हूं।
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भगवान शिव आगे कहते हैं ‘हे देवी बिल्व के पते मेरी जटा के समान है, इसके त्रिपत्र ऋग, यजु व सामवेद हैं, शाखायें समस्त शास्त्र है, तथा ये पृथ्वी के कल्पवृक्ष के समान है जिस पर ब्रह्मा, विष्णु, शिवस्वरूप है। इस वृक्ष का पूजन करना अक्षय पुण्यों को देने वाला है।’
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