सतयुग में भी कामधेनु से बढ़ा लालच

  युगों-युगों से हिंदू धर्म में गाय को पूजनीय माना गया है। गाय के महत्‍व को तो सभी जानते हैं किंतु गाय के कामधेनु स्‍वरूप के बारे में कम ही चर्चा की जाती है। समुद्र मंथन में मूल्यवान रत्न, अप्सराएं, शंख, पवित्र वृक्ष, चंद्रमा, पवित्र अमृत, कुछ अन्य देवी-देवता और हलाहल नामक अत्यंत घातक विष के अलावा कामधेनु गाय की उत्‍पत्ति भी हुई थी।

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पौराणिक कथाओं में वर्णित कामधेनु गाय दैवीय शक्‍तियों से परिपूर्ण थी। माना जाता है कि इसके दर्शन मात्र से ही लोगों के दुखों का निवारण हो जाता था। अपने पालनकर्ता को यह चमत्‍कारी गाय हर तरह से लाभ देती थी। इसका दूध अमृत के समान समझा जाता था। देवताओं सहित बड़े-बड़े ऋषि-मुनियों ने भी कामधेनु के चमत्‍कार को नमन किया है।

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कामधेनु के चमत्‍कार

पौराणिक काल में कामधेनु के विषय में अनेक चमत्‍कारिक कथाएं प्रचलित हैं। महर्षि वशिष्ठ क्षमा की प्रतिपूर्ति थे। एक बार श्री विश्वामित्र उनके आश्रम में अतिथि के रूप में पधारे। महर्षि वशिष्ठ ने कामधेनु के सहयोग से उनका राजोचित सत्कार किया। कामधेनु की अलौकिक क्षमता को देखकर विश्वामित्र के मन में लोभ उत्पन्न हो गया। उन्होंने इस गौ को वशिष्ठ से लेने की इच्छा प्रकट की। कामधेनु वशिष्ठ जी के लिये जरूरी आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु महत्त्वपूर्ण साधन थी, अत: इन्होंने उसे देने में असमर्थता व्यक्त की। विश्वामित्र ने कामधेनु को बलपूर्वक ले जाना चाहा किंतु ऐसा संभव न हो सका। द्वेष-भावना से प्रेरित होकर विश्वामित्र ने भगवान शंकर की तपस्या की और उनसे दिव्यास्त्र प्राप्त करके उन्होंने महर्षि वशिष्ठ पर आक्रमण कर दिया, किन्तु महर्षि वशिष्ठ के ब्रह्मदण्ड के सामने उनके सारे दिव्यास्त्र विफल हो गये और उन्हें क्षत्रिय बल को धिक्कार कर ब्राह्मणत्व लाभी के लिये तपस्या हेतु वन जाना पड़ा।

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