वर्ष 2019 गणेश चतुर्थी (गणेशोत्सव) – 2 सितंबर- सोमवार
गणेश पूजा दोपहर -11 बजकर 5 मिनिट से 1 बजकर 36 मिनिट तक
चतुर्थी तिथि प्रारम्भ- 4 बजकर 56 मिनिट से (2 सितंबर)
चतुर्थी तिथि समाप्त – 1 बजकर 53 मिनिट तक (3 सितंबर)
गणेश चतुर्थी महाराष्ट्र में बहुत ही जोरशोर से मनाई जाती है। महाराष्ट्र के अलावा यह देश-विदेश में भी बड़े ही जोर शोर से मनाई जाती है। भारत एकमात्र ऐसा देश है, जिसमे विभिन्न धर्म के अनुसार विभिन्न त्यौहार मनाये जाते है, आज के इस लेख में हम गणेशोत्सव जो की महाराष्ट्र का गौरव है, जिसकी धूम 10 दिनों तक बनी रहती है, इससे आपको अवगत कराएँगे।

कब मनाई जाती है गणेश चतुर्थी (गणेशोत्सव)
गणेश चतुर्थी भाद्रपद महीने की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को मनाई जाती है। वर्ष 2019 में गणेश चतुर्थी 2 सितंबर सोमवार को है। गणेश भगवान का जन्म शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को मध्याहन काल में सोमवार के दिन स्वाति नक्षत्र तथा सिंह लग्न में हुआ था। यह गणेशोत्सव अनंत चतुर्दशी तक बड़े ही जोर शोर से मनाया जाता है। गणेश चतुर्थी को विनायक चतुर्थी, कलंक चतुर्थी, डंडा चतुर्थी के नाम से भी लोग जानते है।
गणेश विसर्जन-12 सितंबर
गणेश विसर्जन अनंत चतुर्दशी के दिन यानि 12 सितंबर गुरूवार के दिन होगा। दस दिन तक घर में विराजने के बाद गणेश जी अपने घर वापिस चले जाते है और फिर से अगले बरस गणेश चतुर्थी के दिन आते है। इस दिन सर्वप्रथम गणेश जी की प्रतिमा को पूरे विधिविधान से पूजा-आरती करने के बाद पुष्प अर्पण करते है। गणेश बाप्पा को मोदक अति प्रिय है इसलिए उनको विदाई के वक्त मोदक का भोग लगाया जाता है। दूर्वा चढ़ाई जाती है। उसके बाद सब मिलकर उनकी आरती करते है, गुलाल के साथ गाजेबाजे के साथ, ढोल, ताशे बजाते हुए उन्हें विदा किया जाता है, यह मनोरम दृश्य मन को मोह लेता है, गणपती बाप्पा मोरया, अगले बरस तू जल्दी आ इस नारे के साथ बाप्पा की नाम आँखों से विदाई की जाती है।
गणेश चतुर्थी के दिन बरतें विशेष सावधानियां
प्राचीन समय से ही ऐसी मान्यता है की इस दिन चंद्रमा का दर्शन नहीं करना चाहिए, कहते है इस दिन चन्द्रमा के दर्शन करने से कलंक का भागी होना पड़ता है। अगर किसी भूलवश चन्द्रमा के दर्शन हो भी जाए तो इस दोष से छुटकारा पाने के लिए नीचे दिए गये मन्त्र का 108 बार जाप जरुर करें।
वह समय जिसमे चन्द्र दर्शन वर्जित है- 8 बजकर 54 मिनिट 59 सेकेण्ड से 21 बजकर 3 मिनिट तक
चन्द्र दर्शन दोष निवारण मंत्र
सिंह:प्रसेनमवधीत, सिंहों जाम्बवता हत:| सुकुमारक मा रोदीस्तव, हयेष स्यमन्तक:I
पौराणिक कथाओं के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण पर स्यमन्तक मणि चोरी करने का झूठा कलंक लगा था और इस कारण उनको अपमानित होना पड़ा था। उन्हें इस बात का बहुत ही अफ़सोस था, तब नारद जी ने उनकी यह दुर्दशा देखकर उन्हें बताया कि भाद्रपद शुक्लपक्ष की चतुर्थी को गलती से आपके द्वारा चन्द्र दर्शन हुए थे, इसलिए वह तिरुस्कृत तथा अपमानित हुए थे। इस कलंक से मुक्ति पाने के लिए नारद मुनि ने उन्हें यह भी बताया कि इस दिन चन्द्रमा को गणेश जी ने श्राप दिया था इसलिए इस दिन जो भी जातक चन्द्र दर्शन करता है, उस पर मिथ्या अर्थात झूठे आरोप या कलंक लगते है। नारद मुनि की सलाह पर श्रीकृष्ण जी ने झूठे आरोपों से मुक्ति पाने के लिए व्रत किया और इस कलंक से दोष मुक्त हुए, इसलिए इस दिन पूजा तथा व्रत करने से व्यक्ति को झूठे आरोपों से मुक्ति मिलती है।
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गणेश चतुर्थी की कहानी
शिवपुराण के अनुसार एक दिन भोलेनाथ स्नान करने के लिए भोगावती गए, उनके जाने के पश्चात माता पार्वती ने अपने तन के मैल से एक बालक को उत्पन्न करके उसे अपना द्वारपाल बना दिया। जिसे हम गणेश भगवान के नाम से जानते है, पार्वती ने गणेश जी से कहा हे, पुत्र एक मुगदल लेकर तुम द्वार पर बैठ जाओ। मै भीतर जाकर स्नान कर रही हूँ। जब तक मै स्नान न कर लूं, तब तक तुम किसी भी पुरुष को भीतर मत आने देना।
भोगावती में स्नान करने के बाद जब भगवान शिव आए तो गणेशजी ने उन्हें द्वार पर ही रोक दिया। इसे शिव भगवान ने अपना अपमान समझा और बहुत ही क्रोधित हो गए, इस घटना के बाद शिवगणों ने बालक से भयंकर युद्ध किया परन्तु संग्राम में उसे कोई पराजित नहीं कर सका। अंत में भगवान शिव ने क्रोधित होकर गणेश जी का सिर त्रिशूल से अलग करके भीतर चले गये। पार्वती ने उन्हें नाराज देखकर समझा की भोजन में विलंब होने के कारण भोले शिव शंकर नाराज है, इसलिए माता पार्वती ने दो थालियों में भोजन परोसकर शिव को बुलाया।
जब भगवान शिवजी की नजर दूसरी थाली पर पड गयी तो आचम्भित होकर पार्वती से पूछने लगे, यह दूसरा थाल किसके लिए है? पार्वती जी बोली- यह दूसरा थाल पुत्र गणेश के लिए है, जो बाहर द्वार पर पहरा दे रहा है।
यह सुनकर शिव भगवान बहुत ही हैरान हो गये और आचम्भित भी हो गये और बोले तुम्हारा पुत्र पहरा दे रहा है? पार्वती बोली- हाँ नाथ! क्या आपने उसे द्वार पर देखा नहीं? शिवजी बोले, देखा तो था, किन्तु मैंने उदंड बालक समझकर उसका सिर काट दिया। यह सुनकर पार्वती दु:खी होकर रोने-बिलगने लगी। तब पार्वती को प्रसन्न करने के लिए भगवान शिव ने विष्णु जी को आदेश दिया की उत्तर दिशा में सबसे पहले मिले जीव (हाथी) का सिर काटकर ले आयें मृत्युंजय रूद्र ने गज के उस मस्तक को बालक के धड़ पर रखकर बालक को पुनर्जीवित कर दिया। पार्वती इस प्रकार पुत्र गणेश को पाकर बहुत प्रसन्न हुई। उन्होंने पति तथा पुत्र को प्यार से भोजन कराया उसके बाद में स्वयं ने भोजन किया। यह दैवीय घटना भाद्रपद महीने की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को घटित हुई थी, इसलिए यह तिथि बहुत ही ख़ास मानी जाती है और इसे गणेश चतुर्थी के रूप में पूरे भारतवर्ष में मनाया जाता है।
गणेश चतुर्थी व्रत एवं पूजा विधि
- गणेश चतुर्थी के दिन प्रात: जल्दी उठकर नित्य कर्म के बाद स्नान आदि कर सोने, ताम्बे या मिट्टी की एक गणेश मूर्ति लेकर आये वह मूर्ति एक नए कलश में जल भरकर उसके मुहं पर कोरा रूमाल या वस्त्र बांधकर उसके ऊपर गणेश की मूर्ति को विराजमान करें तथा उसे पवित्र स्थान पर स्थापित करें।
- गणेश जी को सिन्दूर एवं उनकी प्रिय दूर्वा अर्पित करके 21 लड्डुओं तथा मोदक का भोग लगायें। भगवान गणेश के सामने दीपक जलाकर गणेश जी के मन्त्र का जाप करना शुभ होता है। ऐसा करने से धन-संपत्ति में वृद्धि होती है।
- भगवान गणेश के सामने फल, फूल अर्पित करें, आरती गाए, तत्पश्चात सभी को प्रसाद बांटे ।
- गणेश जी की आरती सायंकाल के समय भी करनी चहिये। इस दिन गणेश ही के सिद्धिविनायक रूप की पूजा की जाती है तथा व्रत किया जाता है।
- गणेश जी को तुलसी कदापि न चढ़ाए, ऐसी मान्यता है की ऐसा करने से वह नाराज हो जाते है, क्योंकि तुलसी जी ने गणेश जी को शाप दिया था।
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