हर किसी को रंगों से भरे होली के त्योहार का बेसब्री से इंतजार रहता है। कहते हैं कि इस दिन सारे गिले-शिकवे भूलकर दुश्मन भी गले मिल जाते हैं और एक-दूसरे को गुलाल लगाते हैं। होली का त्योहार जीवन में खुशियां लेकर आता है। फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाए जाने वाले होली के त्योहार पर इस बार संशय की स्थिति बनी हुई है। फाल्गुन पूर्णिमा के दो दिन प्रदोष व्यापनी होने से इस बार होली की तिथि के बारे में संशय बना हुआ है। ज्यार्तिविदों के अनुसार इस वर्ष फाल्गुन पूर्णिमा 22 और 23 मार्च दो दिन है जिसमें 22 मार्च को पूर्णिमा तिथि दोपहर 3.13 बजे शुरू होगी, जो 23 मार्च को प्रदोष व्यापनी रहेगी। 23 मार्च को पूर्णिमा तीन प्रहर से अधिक समय और प्रतिपदा तिथि वृद्धि युक्त है। होलिका का दहन भद्रा रहित पूर्णिमा के दिन उचित रहता है। फाल्गुन, 22 मार्च को पूर्णिमा प्रदोष काल में है किंतु इस दिन भद्रा दोपहर 3.13 बजे से 23 को सुबह 4.22 तक रहेगी जिस कारण होलिका दहन 23 मार्च को करना उचित रहेगा।
होलिका दहन का महत्व -: होलिका दहन ईश्वर के प्रति सच्ची भक्ति का प्रतीक है। शास्त्रों में इसे वर्ष की चार महारात्रियों में से एक बताया गया है। पिता हिरण्श्कश्यप ने नारायण के अनन्य भक्त प्रह्लाद को मारने के उद्देश्य से बुआ होलिका जिसे अग्नि से सुरक्षा का वरदान मिला हुआ था के साथ आग में बैठा दिया था। जिसमें नारायण की भक्ति से प्रह्लाद सकुशल बच गया और उसकी कपटी बुआ आग में जलकर भस्म हो गई। बस तभी से बुराई पर अच्छाई की जीत के रूप में हर साल फाल्गुन की बेला पर होलिका दहन किया जाता है।
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क्या है भद्रा -: ज्योतिषियों का मानना है कि भद्रा सूर्यदेव की पुत्री और शनिदेव की बहन है। इसमें कोई भी शुभ कार्य करने की अनुमति नहीं दी गई है। इसी कारण से इस बार होलिका दहन 22 मार्च को न होकर 23 मार्च को किया जाएगा।
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