तलाक वैवाहिक जीवन की सबसे बडी बाधा हैं। आपसी विश्वास, मतभेद, सामन्जस्य की कमी तथा कानून का हस्तक्षेप इन की वजह से रिश्तों में बडी जल्दी दरार पड जाती हैं। हिंदु धर्म में विवाह से पूर्व वर वधु की जन्म कुंडली मिलान किया जाता हैं, जिससे की आपसी सामंजस्य बना रहे और वैवाहिक जीवन अच्छा रहें। लेकिन सिर्फ कुंडली मिलान ही पर्याप्त नही हैं। मै आज आपको तीन ऐसे बिंदु बताने जा रहा हूं जिनकी जानकारी विवाह जैसे नाजुक रिश्ते को मजबूत बना सकती हैं।
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1- विच्छेदक ग्रह विचार- शनि, सूर्य, राहु तथा कुंडली के बारहवें स्थान के मालिक को विच्छेद कारी ग्रह कहा जाता हैं। इन ग्रहों में से कोई भी दो ग्रह या उससे अधिक ग्रह सप्तम भाव पर प्रभाव रखते हैं तो विवाह में कष्ट होता हैं। एवम तलाक के योग बनते हैं। विच्छेदक ग्रह यदि सप्तम स्थान के लिये शुभ (स्वगृही, उच्च, मित्र क्षेत्री या लग्नेश) हो तो दूसरा विवाह अनुकुल होता हैं।
2- सप्तमेष की भाव स्थिति- सप्तम स्थान के मालिक पर जिस प्रकार का प्रभाव रहेगा उसी प्रकार के फल प्राप्त होते हैं। सप्तमेष यदि छठें और बारहवें स्थान में दुष्ट प्रभाव में हो तो यह स्थिति तलाक की बनती हैं। सप्तम भाव का मालिक यदि शनि व सूर्य के साथ 1,2,6,7, 12 स्थान पर हो तो तलाक व कानूनी विरोध उत्पन होता हैं।
3- सप्तम भाव का कारक एवम नवांश – स्त्रीयों की जन्म कुंडली में गुरु तथा पुरुषों के लिये शुक्र सप्तम स्थान का कारक होता हैं। कारक ग्रह यदि सप्तम या द्वादश स्थान में स्थित हो तथा एक भी विच्छेद कारी ग्रह का इन पर प्रभाव हो तो विवाह विच्छेद हो जाता हैं। इसी प्रकार नवांश लग्न में द्वादश स्थान का मालिक बैठा हो तथा लग्नेश विच्छेदक ग्रहों के संग हो तो विवाह में अति शीघ्र अलगाव स्थिति बन जाती हैं।
उपाय व परिहार- जन्म कुंडली में यदि इस तरह की स्थिति बन रही हो तो विवाह में अनेक दिक्कते आती है। वस्तुत: डिवोर्स इन तीन कारणों में से किसी कारणवश होता है। उपरोक्त तीनों स्थितियों में से जो स्थिति जन्म कुंडली में बनती हो उसका उपाय अवश्य करें। उसके अलावा निम्न उपाय करने से आपको लाभ प्राप्त हो सकता है।
1- सप्तमेश का शुभ व बली प्रभाव विवाह के अनेक दोषों का नाश करता हैं। अत: कुंडली में सप्तम स्थान पर यदि अशुभ प्रभाव हो तो सप्तमेश के लिये दान व पूजा करनी चाहिये। स्वास्थ्य यदि उत्तम रहता हो तो सप्तमेश का रत्न पहना जा सकता हैं।
2- विवाह से पूर्व कुम्भ या पीपल विवाह करवाना चाहिये।
3- बारहवें स्थान के मालिक का शांति पाठ करवाये। व उस ग्रह सम्बन्धी वस्तुओं को जल में प्रवाहित करें।
4- विच्छेदक ग्रहों का अत्यधिक प्रभाव हो तो शतचण्डी का पाठ करना चाहिये।
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